वो भोर की खौफनाक दौड़ (भाग: 1)

(भाग: 1) स्थान तथा पात्र परिचय
सत्य घटना पर आधारित आपबीती कथा….
घटना स्थल : नरौरा (परमाणु ऊर्जा केन्द्र स्थल), जिला बु0ष0, उ0प्र0. घटना : सन् 1997
समय : प्रातः काल
कथा नायक मंगल गुप्ता, मूंगा (काल्पनिक नाम)
{सात (7) खण्डों में आबंटित}

इस आपबीती कथा में कुछ अपषब्दों का प्रयोग है चुॅंकि यह कथा मित्रों के बीच संवाद पर आधारित है। ये घटना नरौरा में सन् 1997 की है जब मैं नवीं कक्षा की परिक्षा देकर अपनी गरमी की छुट्टियों को प्लान कर रहा था।

अब मैं जरा अपने वर्तमान मित्रों को भूत में लेकर जाता हूॅं जहाॅं उनके नवयुवावस्था केे साथ ही भावी युवाओं को भी थोड़ा उत्साह और आनंद मिलेगा। आज मेरी उम्र करीब 40 वर्श की है, और मैं अब भी चुस्त दुरूस्त हूॅं, लेकिन उस नवीं कक्षा वाला जोष, उमंग और उत्साह अब वापस नहीं ला सकता।
उस समय मुझे षरीर बनाने का एक जुनून सा सवार हो गया था और हम में रितिक रोषन बनने का एक नायाब जज्बा घुस गया था। हालांकि रितिक रोषन सन् 2000 में प्रकाषित हुये लेकिन इनके आने से पहले ही हम अपनी तैयारी में लग चुके थे।
तो इसके लिये ग्रिश्मावकाष का पूर्ण सदुपयोग करने का विचार बनाया और अपने एक मित्र मंगल गुप्ता, (मूंगा) के साथ प्रातः दौड़, वर्जिष और कुष्ती की तैयारी में लग गये।
अब मेरी दिनचर्या प्रातः 3ः45 से प्रारंभ हो गयी, जिसमें मैं 15 मिनट में नित्य कर्म आदि के बाद झटपट साइकिल निकाल लेता और अपने काॅलोनी के निवास स्थान से लगभग 4.की0मी0 दूर जाकर अपने मित्र मंॅूगा के साथ दौड़ और व्यायाम स्थल पहुॅंच जाता था। वहाॅं पहुॅंचकर हमलोग एक निष्चित स्थान पर साइकिल खड़ी करते और वहाॅं से दौड़ लगाना प्रारम्भ कर देते। वहाॅं से तीन की0मी0 दौड़ समाप्ती के साथ ही आ जाता था अपना वर्जिष तथा कुस्ती केंद्र जो वहाॅं के ग्रामिण युवकों द्वारा तैयार किया हुआ था।
अब कुछ आगे बढ़ने से पहले मैं जरा अपने मित्र मूंगा के बारे में लघु परिचय देता चलूॅं, क्योंकि मूंगा ही इस कथा का नायक है। मैं तो साइड रोल में हूॅं।
बताता चलूॅं कि मेरा मित्र मूंगा सरकारी विद्यालय मंे पढ़ने वाला नवीं कक्षा का छात्र था। पढ़ाई में एकदम औसत था। परिक्षा में उसका लक्ष्य मात्र पास होना ही रहता था इससे अधिक बिल्कुल भी नहीं। लेकिन खेल-कूद में उसकी विषेश रूची थी, खासतौर पर वो कुष्ती का खिलाड़ी था। वो अपने विद्यालय तथा आसपास के क्षेत्रों से होने वाले जूनियर कुष्ती दंगल में कई मेडल और इनाम प्राप्त कर चुका था। उसके षरीर की लम्बाई 5 फिट 4 या 5 इंच थी मतलब औसत लम्बाई से कुछ कम थी लेकिन उसके षरीर की बनावट गठीली और सुडौल थी। वास्तव में जैसा षरीर पहलवान का होना चाहिए एकदम उसके ही अनुरूप था। सांवला रंग तथा षरीर में बिजली जैसी फूर्ती, चेहरे पर मुसकुराहट और मुॅंह से एकदम हाजिर जवाब। लोगों की सहायता करना उसे अच्छा लगता था। इसलिये युवा वर्ग में तो वो हीरो था ही साथ ही अपने आस-पड़ोस से लेकर आसपास के इलाकों तक वो फेमस बंदा था।

लेकिन धरती पर पैदा हुआ ऐसा कोई इंसान नहीं होगा जिसके अंदर गुणों के साथ कोई कमी या अवगुण न हो। अपने गठीले षरीर और अपनी उम्र के युवाओं में कुष्ती विजेता होने के कारण उसको अपने आप पर काफी गर्व और अहम भाव था।
और इसी अहम भाव की वजह से उसकोे दूसरों के फटे में टांग डालने की आदत बन गई थी। और इसी कमी के चलते इस घटित घटना का भी जन्म हुआ।

ऐसा कोई भी दिन नहीं होता था जब वो बाहर किसी न किसी से झगड़ा नहीं करता हो। और वो ऐसा अपना षौक पूरा करने के लिये नहीं बल्कि दूसरों की मदद करने में ही करता था। वो प्रति दिन स्कूल से आने के बाद बाहर घूमने निकता था और ऐसे आदमियों को खोज लेता जो किसी न किसी बात पर विवाद कर रहे हों। अब वो उनके बीच में घुस जाता और मैटर समझता, फिर जिसकी गलती होती उसे वो या तो प्यार से समझाता या मार से। जो लोग उसको जानते थे वो तो बातों से ही मान जाते थे, लेकिन जो उसे नहीं जानते थे वो उस दिन उसको जान ही जाते थे। और ऐसा करने में उसे उन लोगों का भी पूरा सहयोग मिल जाता जिसके पक्ष से वो लड़ रहा होता। इसलिये उसका मन बढ़ने लगा, लेकिन उसकी एक सबसे अच्छी बात ये थी कि वो कभी किसी को नाहक परेषान नहीं किया करता था।

क्रमशःनिरंतर (भागः 2 में पढ़िये) वो भोर की खौफनाक दौड़ (भाग: 2) – LekhVani.com

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