लॉकडाउन है या कमाई का साधन!

लाॅकडाउन कब तक आखिर कब तक???
वर्तमान भारत में सरकारी कर्मचारियों की संख्या 11 से 15 प्रतिषत है, जिन्हें वर्तमान स्थिती के आधार पर मासिक वेतन भले कुछ कम हो कर मिले लेकिन समय पर बड़े इत्मिनान से मिल रहा है, उसमें भी लाॅकडाउन से जुड़े अधिकारी वर्ग की कमाई वेतन के अलावा भी बहुत अच्छी हो रही है जिसका हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं, अनुसंधान नहीं कर सकते।
सरकारी वर्ग की ये संख्या भारत की जनसंख्या का चैथाई भाग भी नहीं है अर्थात लगभग 85 प्रतिषत भारत की जनता के रोजगार और आमदनी का जरिया केवल निजी क्षेत्र ही है जो कि लाॅकडाउन की वजह से बुरी तरह से क्षतिदायक हो चुका है, जिनमें कई सारे छोटे व्यापारी जो कि रोज कमाने वाले वर्ग से हैं उनकी तो कमर ही टूट गई है।

कोरोना का रोना!
जब से कोरोना का रोना विष्वविख्यात हुआ है तब से सरकार ने लाॅकडाउन की प्रथा सी चला रखी है। अब लाॅकडाउन नाजायज हो रहा है या जायज इसके बारे में खास आदमी के अलावा आम आदमी को जानकारी नहीं हो सकती और कोई इसके पीछे का राज जान भी ले तो कुछ कर नहीं सकता है।
भारत सरकार द्वारा मई 2020 को लाॅकडाउन खोलने के बाद सभी राज्य सरकारों को ये खुली छूट दी गई है कि वे अपने राज्य में कोरोना बढ़ने या घटने के आधार पर जब और जितना चाहें लाॅकडाउन लगा सकते हैं। इसी आधार पर सभी राज्य सरकारों ने ये खुली छूट जिले के अधिकारियों को दे रखी है। और इसी आधार पर भारत के विभिन्न राज्यों के विभिन्न जिलों में वहाॅं के मौजूदा अधिकारियों द्वारा लाॅकडाउन को विस्तारित किया जा रहा है।
लाॅकडाउन को बराबर बढ़ाने तथा मूॅंह पर मास्क बंधवाने का एक और बड़ा कारण ये है कि आम जनता में कोरोना का डर बना रहे क्योकि जैसे ही लोगों में इस कोरोना का भय खत्म हो जोयेगा तो संगरोधक केंद्र और मास्क जैसे फालतू चीजों से होने वाली नई कमाई की व्यवस्था भी जल्द ही निपट जायेगी।

लाॅकडाउन और मास्क दोनों हैं व्यापार का साधन पहले समझिये कोरोना का आकार और मास्क छिद्र का आकार
मास्क के छिद्रों का आकार मनुश्य के सिर के बालों की अपेक्षा लगभग 5-6 गुना बड़ा होता है यदि सिर के बाल के आकार को वैज्ञानिक दृस्टिकोण से देखा जाए तो सिर का बाल लगभग 120000 नैनोमीटर व्यास का होता है अतः मास्क के छिद्र का आकार लगभग 120000 × 5 = 6 लाख नैनोमीटर होगा।
दुसरी ओर कोरोनावायरस के आकार का यदि हम मापन करते हैं तो पता लगता है कि कोरोना वायरस का व्यास मात्र 120 नैनोमीटर होता है।
अब आप स्वयं कल्पना कीजिए कि क्या हम 6 लाख नैनोमीटर व्यास वाले छिद्र से 120 नैनोमीटर व्यास के वायरस को रोक सकते हैं क्या???

इसलिये कोरोना से बचाव के लिये साधारण मास्क पहनना केवल मूर्खता है
मनुष्य शरीर को जीवित रहने के लिए आक्सीजन की आवष्यकता होती है जिसकी आपूर्ति मनुश्य सांस लेकर करता है। परंतु सांस लेने पर वायुमंडल में उपस्थित अन्य तत्व नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बन.डा0 भी हमारे शरीर मंे प्रवेश करते रहतेे हैं। आपने मास्क लगा कर यह अनुभव किया होगा कि आप बिना मास्क के साॅंस लेने में जितनी सहजता महसूस कर रहे थे उतनी सहजता मास्क लगाने के बाद नहीं करते हैं क्योंकि मास्क लगाने के बाद वायुमंडल से हमारे शरीर में पहुॅंचने वाले आवष्यक तत्व फिल्टर हो जाते हैं तथा मास्क में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिनका आकार इन तत्वों की अपेक्षा बड़ा होता है, और कभी कभी इस कारण दम घुटने से मृत्यु होने की भी संभावना कुछ हद तक बढ़ जाती है जिन्हें श्वास संबंधित समस्या हो। अतः मेरे अनुसार मास्क केवल व्यापार है तथा मास्क लगाना उतना ही बेवकूफी भरा कार्य है जितना पारदर्शी शीशे के पीछे खड़े होकर स्वयं को छिपाना। हाॅं मास्क पहन कर धूल-माटी से आप जरूर बच सकते हैं।

आईये अब समझते हैं लाॅकडाउन के पीछे हो रहे अनुमानित घपलेशन के बारे में
कोरोना टेस्टिंग किट का गलत मापदंड
क्या आप जानते हैं कि पूरे विष्व भर में अब तक निर्मित सभी ‘कोरोना टेस्टिंग किट’ की परिषुद्धता (Accuracy) मात्र 50 प्रतिषत है अर्थात यदि एक ही आदमी का कोरोना टेस्ट मौजूदा ‘कोरोना टेस्टिंग किट’ से दस बार किया जाये तो उसका रिाजल्ट पाॅंच बार पाॅजिटिव और पाॅच बार निगेटिव आयेगा, मतलब हर एक टेस्ट के बाद पाॅजिटिव या निगेटिव कुछ भी आ सकता है। जब इस टेस्टिंग किट की कोई उचित परिषुद्धता या मापदंड है ही नहीं तो किस आधार पर किसी को भी पाॅजिटिव या निगेटिव ठहराया जा रहा है। इसका कारण जानने का किसी ने प्रयास नहीं किया है।

कोरोना पाॅजिटिव करने के पीछे छुपा राज
(निजी जानकारी के आधार पर)
मैं स्वयं कोरोना जाॅंच केंद्र में गया और मैने वहाॅं मौजूद लैब कर्मचारी से इसके बारे में जानकारी लेने का प्रयास किया लेकिन इसके बारे में कर्मचारी ने ये कहते हुये पल्ला झाड़ दिया कि इसके बारे में कुछ बताना सरकारी नियमों का उल्लंघन होगा इसलिये उसने किसी भी प्रकार की जानकारी देने से स्पश्ट मना कर दिया।
इसी प्रकार किसी क्षेत्र में कोरोना पाॅजिटिव मरीज निकालने के बाद उस क्षेत्र की घेराबंदी कर के सील करने वाले कर्मचारियों की भी आमदनी वर्ग फूट के हिसाब से एकदम फिक्स है। इसी कारण एरिया को जल्द से जल्द सील किया जाता है।

संगरोधक केद्र में भेजने का कारण
(निजी अनुमान के आधार पर)
मैने निजी तौर पर कुछ संगरोधक केंद्रों का दौरा ये जानने के लिये कि वास्तव में वहाॅं हो क्या रहा है? मैने पाया कि सभी संगरोधक केंद्र एक बहुत मोटी कमाई का बेहतरीन साधन बना हुआ है। वहाॅं मौजूद कुछ कोरोना मरीज बनाये गये लोगों से पूछने पर ये जानकारी मिली कि उन्हें प्रति दिन तीन बार भोजन और पीने के लिये सिल्ड पानी का बोतल दिया जाता है। इस पर प्रतिदिन होने वाले खर्च के बारे में जानने का प्रयास किया तो वहाॅं के कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें इस भोजन-पानी के खर्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं है, जबकि वो भलि-भाॅंति जानते थे। किन्हीं अलग-अलग सूत्रों के माध्यम से जब मैने जानकारी एकत्रित की तो पता चला कि वहाॅं एक आदमी पर राज्य सरकार की तरफ से 1500.रू से लेकर 2500.रू तक खर्च दिया जाता है, लेकिन वास्तव में एक आदमी पर तीनों टाइम के भोजन और पानी के खर्चोे को मिलाकर मुष्किल से 500.रू भी खर्च नहीं होता।
मतलब एकदम साफ है कि एक आदमी पर 500.रू से लेकर 1500.रू की षुद्ध बचत प्रतिदिन होती है। और ये आंकड़ा तो मात्र संगरोधक केंद्र का है। जरा सोचिये कि जहाॅं से इस काम के लिये पैसा चलता है तो बीच में कितने अधिकारियों के माध्यम से होता हुआ अंत में यहाॅं पहुॅंचता है। तो सोचिये कि यदि एक संगरोधक केंद्र के नीचले स्तर पर प्रति दिन प्रति व्यक्ति इतनी आमदनी है तो अधिकारी स्तर के पास प्रति दिन कितने की आमदनी होती होगी और मासिक वेतन अलग।

अस्पतालों में खुली लूट
फिलहाल धीरे-धीरे अब कोरोना का खौफ लोगों के दिमाग से निकल रहा है लेकिन आज अगस्त 2020 से करीब माह-दो माह पूर्व की स्थिती जो समाचारों के माध्यम से हमने देखा होगा कि कई बड़े षहरों में कई लोग रूपयों से भरा थैला और अपने कोरोना या गैर कोरोना मरीज को लेकर गैर सरकारी अस्पतालों के बाहर खड़े हैं और अस्पताल वाले केवल उन्हीं मरीजों को ले रहे थे जिनके थैले ज्यादा वजनदार थे।
यहाॅं तक कि हेल्थ इंस्योरेंस का मेडीक्लेम लिये हुये लोगों को भी उस मेडीक्लेम का कोई विषेश लाभ नहीं मिल सका।
एक घटना, दिल्ली में रहने वाले एक युवक की बात है जो मेरे मित्र के मित्र थे वे अपने बिमार पिता को लेकर एक बड़े गैर सरकारी अस्पताल में गये और वहाॅं उन्होंने अपना सात लाख का मेडीक्लेम दिखाया। मेडीक्लेम देखते ही अस्पताल के कर्मचारी ने दो टूक जवाब में कहा कि अभी केवल कैष पर ही जाॅंच सम्भव है। मेडीक्लेम पर हम जाॅंच नहीं करेंगे। इस प्रकार वो अपने पिता को लेकर अस्पताल दर अस्पताल घूमते रहे और अंततः उनके पिता की मृत्यू हर्ट अटैक से हो गई और अंतिम जॉंच में यह पता चला कि उन्हें कोरोना नहीं था।
मित्रों ये तो एक छोटा सा उदाहरण मात्र है, यदि इसपर और षोध किया जाये तो ऐसी अनगिनत घटनायें मिल जायेंगी जो कि अस्पतालों की दरिंदगी को स्पश्ट दर्षा देगी। तो यहाॅं भी एक बात स्पश्ट हो जाती है कि कोरोना के नाम पर सरकारी या गैर सरकारी अस्पतालों में लोगों के डर का नाजायज भयादोहन किया जा रहा है।

लाॅकडाउन! हितकारी या अहितकारी
वर्तमान में विस्तारित होते जा रहे लाॅकडाउन से आपको क्या लाभ मिल रहा है अथवा आपको किस तरह की कठिनाइयाॅं झेलनी पड़ रही हैं? कमेंट सेक्सन में अपनी स्थिती बताते हुये अपनी राय दें, ताकि मैं आपके सहयोग हित में और भी लिख सकूॅं।

वन्दे मातरम्

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *